क़ुरआने मजीद की दो आयतों में’’اِستَعینُوا بِالصّبرِ وَ الصّلٰوةِ‘‘आया है यानी सब्र और नमाज़ के द्वारा अल्लाह से सहायता मांगिये। एक जगह अहले किताब (ईसाई, यहूदी आदि) से कहा गया है’’’’اِستَعینُوا بِالصّبرِ وَ الصّلٰوةِوَ إِنّهَا لَكَبِیرَةً إِلَّا عِلىٰ الخَاشِعِینَ‘‘और एक जगह मोमिनीन से कहा गया है’’یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آمَنُوا اِستَعینُوا بِالصّبرِ وَ الصّلٰوةِ إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِینَ‘‘इन दो आयतों में एक तो सब्र और नमाज़ का महत्व बताया गया है और दूसरे नमाज़ और सब्र का सम्बंध बयान किया जा रहा है कि इन दोनों का एक दूसरे के साथ गहरा सम्बंध है। इस दूसरी आयत से पहले ’’فَاذكُرُونِى اَذكُرُكُم وَ اشكُرُوا لِى وَ لَا تَكفُرُونَ‘‘आया है यानी तुम मुझे याद रखो मैं तुम्हे याद रखूँगा और मेरा शुक्र करो और कुफ़्र न करो। यानी ज़िक्र और शुक्र की बात की गई है। इसके बाद जेहाद की बात की गई है-’’وَ لَا تَقُولُوا لِمَن یُّقتَل فِى سَبِیلِ اللَّهِ اَموَات بَل أَحیَاء وَ لٰكِن لَا تَشعُرُونَ‘‘जो लोग ख़ुदा के लिये क़त्ल किये गए उन्हें मरा हुआ न कहना, वह ज़िन्दा हैं और ख़ुदा की ओर से रिज़्क़ पाते हैं लेकिन यह बात तुम्हारी समझ से बाहर है। इसके बाद की आयत-’’وَ لَنَبلُوَنَّكُم بِشَىءٍ مِنَ الخَوفِ وَ الجُوعِ وَ نَقصٍ مِّنَ الاَموَالِ وَ الاَنفُسِ وَ الثَّمَرَاتِ وَ بَشِّرِ الصَّابِرِینَ‘‘और हमें तुम्हे डर, भूख, माल की कमी, इन्सानों की कमी, पलों की कमी के द्वारा आज़माएंगे और सब्र करने वालों को ख़ुशख़बरी दीजिए।’’اَلَّذِینَ إِذَا أَصَابَتهُم مُصِیبَةُ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَ إِنَّا إِلَیهِ رَاجِعُونَ‘‘जब न पर कोई मुसीबत पड़ती है तो सब्र करते हैं और कहते हैं हम अल्लाह के लिये हैं और हमें लौट के उसी की ओर जाना है।’’اُولٰئِكَ عَلَیهِم صَلَوَاتُ مِّن رَّبِّهِم وَ رَحمَة‘‘इन्हीं लोगों पर ख़ुदा का दुरूद और उसकी रहमत है। इन आयतों से सब्र और नमाज़ के बीच सम्बंध का भी पता चलता है।सब्र और सलात का सम्बंधइन आयतों में’’صلٰوة‘‘का मतलब केवल नमाज़ नहीं है बल्कि ख़ुदा की याद, उस से दिल लगाना, उसके साथ सम्पर्क करना। और सब्र यानी जमे रहना, डटे रहना। सब्र के बारे में क़ुरआने मजीद की एक आयत है-’’وَ اصبِر وَ مَا صَبرُكَ إِلَّا بِاللَّهِ‘‘यानी सब्र करो, जमे रहो और जान लो कि अल्लाह की सहायता के बिना तुम सब्र नहीं कर सकते हो। अब देखें सब्र और सलात में क्या सम्बंध है? सब्र यानी डटे रहना, जमे रहना और सलात यानी ख़ुदा की याद। इन्सान उसी समय हक़ पर जमा रहेगा जब वह ख़ुदा को याद रखेगा, अगर उसनें ख़ुदा को भुला दिया तो उसके क़दम लड़खड़ा जाएंगे। लेकिन अगर ख़ुदा को याद रखा तो हर मैदान में डटा रहेगा, जमा रहेगा और आगे बढ़ता रहेगा, किसी भी मैदान में रुकेगा नहीं और नाहि पराजित होगा बल्कि इन्सानियत और रूहानियत व आध्यात्मिकता की उस चोटी पर पहुँचेगा जहाँ उसे पहुँचना है।अगर सब्र न हो?जब दो फ़ौजें जंग के मैदान में एक दूसरे से लड़ती हैं तो सफल वही होती है जो आख़िर तक डटी रहे, सब्र करती रहे लेकिन जिसका सब्र ख़त्म हो जाए वह पराजित हो जाती है क्योंकि यहाँ सफलता और असफलता इस पर निर्भर करती है कि कौन मैदान में जमा रहता है। जीवन के हर मैदान में ऐसा ही है और यही उसूल लागू होता है। जीवन के रास्ते में बहुत सी कठिनाइयां और रुकावटें आतीं हैं जो उससे लड़ती हैं और इन्सान उनसे लड़ता है, अगर इन्सान उनसे लड़ता रहे, हिम्मत न हारे, जमा रहे तो एक दिन रुकावटें ख़त्म हो जाएंगी, कठिनाइंयां हार मांग लेंगी और इन्सान जीत जाएगा लेकिन अगर इन्सान नें सब्र से काम न लिया तो कठिनाइयां उसकी कमर तोड़ देंगी। क़ुरआने मजीद में कहा गया है-’’حزب اللہ‘‘अल्लाह का गिरोह, अल्लाह की फ़ौज सफल है। या कहा गया है- اللہ’’عباداللہ‘‘अल्लाह के बंदे कामयाब हैं। यह कामयाब किस तरह होते हैं? यह इसलिये कामयाब होते हैं क्योंकि यह अल्लाह के रास्ते पर होते हैं। उसे याद करते रहते हैं, उसका ज़िक्र करते हैं। अगर यह ऐसा न करें तो किसी भी मैदान में क़दम जमा नहीं सकते, जिसका असर यह होगा कि उनकी जीत नहीं होगी. इसलिये यह नमाज़, यह रोज़ा, यह दुआएं, यह इबादतें, यह रमज़ानुल मुबारक इसिलये है ताकि इन्सान अपने दिल में ख़ुदा की याद बसाए और दिल को इतना मज़बूत कर ले कि किसी भी मैदान में नाकाम न हो।सब्र की क़िस्मेंसब्र के बारे में बहुत सी हदीसों में आया है कि सब्र तीन तरह का होता है। ख़ुदा की इताअत में सब्र, गुनाह में सब्र और मुसीबत में सब्र। इताअत में सब्र का मतलब यह है कि जब आपको कोई वाजिब काम करना हो, जब कोई ज़रूरी काम करना हो तो आप उससे ऊब न जाएं, थक न जाएं, आपके अन्दर सुस्ती न आ जाए। एक दुआ लम्बी है, एक नमाज़ लम्बी है इन्सान यह सोचकर थक न जाए बल्कि जो ख़ुदा नें कहा है वह करे चाहे वह कम हो या ज़्यादा, उसमें कम टाईम लगता हो या ज़्यादा। रोज़ा रख रहा है तो उससे थक न जाए, क़ुरआन की तिलाबत से ऊब न जाए, इबादत से उसका दिल उचाट न हो जाए। यह है इताअत में सब्र। गुनाह पर सब्र यानी गुनाह से ख़ुद को रोके। वह आसानी से गुनाह कर सकता हो, सब कुछ तैयार हो, कोई रोकने वाला भी न हो लेकिन रुक जाए, गुनाह की ओर न बढ़े, दिल में जो बुरी इच्छा उभरी है उसे झिटक दे। जवानी की उमंगे दिल में करवटें लेने लगें और इन्सान का मन उसे पवित्रता के विरुद्ध कोई काम करने को कहे। किसी जगह से ग़लत तरीक़े से पैसा मिल रहा हो, रिशवत दे कर किसी ग़रीब की जगह अच्छी नौकरी मिल रही हो, झूठ, धोखा और मक्कारी से बड़ा बनने का चान्स हो। इन चीज़ों में इन्सान ख़ुद को रोक ले और उनकी तरफ़ न बढ़े, यह गुनाहों में सब्र है। मुसीबत में सब्र यह है कि जीवन में जो कठिनाइयां हैं, दुर्घटनाएं हैं, जान से ज़्यादा कोई प्यारा दुनिया से चल बसे, इन्सान सख़्त बीमार हो जाए, पैसे की कमी हो जाए या इस तरह की कोई भी मुसीबत आए तो इन्सान हिम्मत न हारे, यह न सोचने लगे कि उसकी दुनिया बर्बाद हो गई बल्कि सब्र करे, ख़ुद को संभाले, अल्लाह से सहायता मांगे।इनमें हर एक सब्र ज़रूरी है और सब्र करने वाले पर ख़ुदा की रहमत होती है यानी ख़ुदा उसे अकेला नहीं छोड़ता बल्कि उसकी सहायता करता है’’اُولٰئِكَ عَلَیهِم صَلَوَاتُ مِّن رَّبِّهِم وَ رَحمَة‘‘इन्हीं लोगों पर ख़ुदा का दुरूद और उसकी रहमत है।
23 जुलाई 2013 - 19:30
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आया है यानी सब्र और नमाज़ के द्वारा अल्लाह से सहायता मांगिये। एक जगह अहले किताब (ईसाई, यहूदी आदि) से कहा गया है